1962के बाद पहली बार हुई वशिष्ठ ताल की धार्मिक यात्रा।

------------- प्रकाश कपरूवान ।
जोशीमठ,14 सितम्बर।
भारत-चीन सीमा से सटे माना बार्डर पर यूँ तो देवताल तक की यात्रा विगत कुछ वर्षों से हो रही है, लेकिन पहली बार देवताल से करीब ढाई किमी आगे वशिष्ठ ताल की यात्रा भी शुरू हो गई,इस यात्रा में देश के अन्तिम गांव माना के 45 सदस्य शामिल हुए।
करीब 18 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित बेहद खूबसूरत वशिष्ठ ताल हिमशिखरों के बीच बिद्यमान है।
वर्ष 1962 भारत-चीन युद्ध से पूर्व माना दर्रे से तिब्बत ब्यापार का मार्ग वशिष्ठ ताल से होकर ही जाता था, और तिब्बत ब्यापार से जुड़े लोग वशिष्ठ ताल में पूजा-अर्चना के बाद ही तिब्बत के थोलिंग मठ पहुंचते थे।
वर्ष 1962 के बाद वशिष्ठ ताल तक कोई नहीं पहुंच पाया था, जिसका प्रमुख कारण चीन सीमा से सटे होने के साथ ही सुरक्षा व सामरिक दृष्टिकोण भी रहा होगा, अब सड़क निर्माण के बाद वशिष्ठ ताल की यात्रा व माना घाटी के ग्रामीणों की परंपरागत पूजा का मार्ग भी प्रशस्त हो गया है।
देश के अन्तिम गाँव माना के 45 सदस्यीय दल जिसमें  महिलाएं भी शामिल थी ने वशिष्ठ ताल जिसे भू अभिलेखों के अनुसार परी ताल भी कहा जाता है ,पहुंचकर पूरे धार्मिक अनुष्ठान के साथ पूजा/अर्चना की व ध्वज रोपण किया।
सीमान्त ग्राम माना के इस यात्री दल मे ग्राम प्रधान पीताम्बर सिंह मोल्फा के अलावा देव सिंह परमार, प्रेम सिंह बड़वाल, सुरेन्द्र सिंह, नरेन्द्र सिंह रावत, आनंदी देवी,गायत्री देवी, जसोमति परमार, लीला देवी,व प्रभा राणा आदि शामिल थे।
वशिष्ठ ताल की मान्यता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के कुलगुरू मुनि वशिष्ठ ने मानसरोवर यात्रा से पूर्व इसी स्थान पर तपस्या की थी, इसलिए इस ताल को1 वशिष्ठ ताल कहा जाता है,जिसे अब परी ताल के नाम से भी जाना जाता है।

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