------------ अनसूया मलासी।
रुद्रप्रयाग।
चण्डी प्रसाद भट्ट पर्यावरण एवं विकास केंद्र गोपेश्वर की ओर से पांच दिवसीय बुग्याल बचाओ जनजागरण और अध्ययन अभियान के दौरान रुद्रप्रयाग के त्रिजुगीनारायण से लेकर टिहरी जिले की भिलंगना घाटी के एक दर्जन से अधिक बुग्यालों का अध्ययन किया गया। बुग्यालों में रह रहे भेड़ पालकों, पशुचारकों और आसपास के ग्रामीणों के साथ बुग्यालों के संरक्षण और समस्याओं को लेकर विचार-विमर्श किया गया। अभियान दल में सामाजिक कार्यकर्ता, वनविद, पत्रकार और केदारनाथ वन्यजीव वन प्रभाग चमोली तथा टिहरी वन प्रभाग के अधिकारी कर्मचारी भी साथ रहे।
वरिष्ठ पत्रकार व्योमेश जुगरान के नेतृत्व मे चले इस अभियान की शुरुआत रुद्रप्रयाग जिले के फाटा गांव से हुई। फाटा और त्रियुगीनारायण में गोष्ठी आयोजित की गई, गोष्ठी में हिमालयी बुग्यालों को प्लास्टिक कचरे से मुक्त कराने का संकल्प लिया गया। इस दौरान अभियान दल के सदस्यों द्वारा पर्यावरण गोष्ठी के माध्यम से बुग्यालो की स्थिति और उनके संरक्षण को लेकर ग्रामीणों, पशुपालकों, बुग्यालॉ मे निवास कर रहे पशुपालकों के साथ संवाद कर विस्तार से चर्चा- परिचर्चा की गई।
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पंवालीकांठा बुग्याल से पदयात्री दल ने घुत्तू में गोष्ठी आयोजित की, यहां मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए जिला पंचायत सदस्य विजय लाल ने बुग्यालों मे बढ़ते पशु चारण पर चिंता व्यक्त करते हुए सभी लोगों से इस विषय पर चिंतन करने की अपील की। उन्होंने सभी लोगों से बुग्यालों को बचाने को लेकर आगे आने की अपील करते हुए कहा कि सभी के सामूहिक प्रयासों से ही प्रकृति की यह धरोहर सुरक्षित रह सकती है।
समापन गोष्ठी में अभियान दल के व्योमेश जुगरान ने पुराणों में बतायी गई हिमालय की महिमा के उल्लेख से अपनी बात रखते हुए कहा कि इसे स्वयं भगवान शंकर ने अपना आलय बताया है। यह भगवान शिव की भूमि है। वेदव्यास ने हिमालय में ही वेदों की रचना की है। यह क्षेत्र धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से कितना महत्वपूर्ण होगा समझा जा सकता है। उन्होंने कहा कि हिमालय ही हमारे सनातन धर्म संस्कृति का आधार और जीवन मूल स्रोत है।
ओम प्रकाश भट्ट ने पँवाली बुग्याल की स्थिति पर अपने विचार रखते हुए कहा कि, पँवाली बुग्याल की स्थिति चिंतनीय है। कई जगह भू-धंसाव होने लगा है, जो चिंतनीय है। पशुओ की संख्या बुग्याल की धारण क्षमता से कई अधिक है। हमें यह समझना होगा कि बुग्याल हिमालय की आत्मा है। इसीलिए हमारे पूर्वजों ने शायद बहुत पहले ही बुग्यालों पर आने वाले खतरों को भांप लिया था तभी उनके द्वारा बुग्यालों के संरक्षण के लिए कई नियम तथा कायदो का जैसे बुग्यालों में समय से पूर्व नहीं जाना, रहने के तौर- तरीकों और कई स्थानों पर बोलना,थूकना आदि क्रियाकलापों को निषेध कर कई ऐसे ही अन्य नियमों का सृजन किया गया था।
सी पी भट्ट पर्यावरण एवं विकास केंद्र के विनय सेमवाल ने जानकारी देते हुए बताया कि, चण्डी प्रसाद भट्ट पर्यावरण एवं विकास केंद्र द्वारा वर्ष 2014 से बुग्यालों के संरक्षण के लिए *बुग्याल बचाओ अभियान* चलाया जा रहा है, जिसके तहत न्यास के स्वयं सेवियों द्वारा बुग्यालों में हो रहे परिवर्तनों के अध्य्यन करने के साथ ही वहाँ पड़े कचरे को एकत्रित कर निस्तरण स्थल तक पहुंचाया जाता है।
मोहन पंत ने कहा कि पर्यटकों को चाहिये कि वो हिमालय क्षेत्र में यात्रा के दौरान प्लास्टिक की वस्तुओं का उपयोग ना करें तथा अपने साथ कचरे के लिए एक खाली बैग भी रखें। किसी भी प्रकार का कचरा बुग्यालों के लिए घातक है। गोष्ठी में सामाजिक कार्यकर्ता सुशील भट्ट ने कहा कि हमें चाहिए कि पौधरोपण के दौरान हम हिमालय क्षेत्र में उस क्षेत्र विशेष की ही स्थानीय प्रजाति के पौधों का रोपण करें। बुग्यालों में टूरिस्ट गाइड का काम करने वाले गाइडों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
इस दौरान गोष्ठी में विनय सेमवाल, सुशील भट्ट, टिहरी वन प्रभाग के वन दरोगा मंगल सिंह गुसाई, संदीप राणा, शिव सिंह राणा, क्षेत्र पंचायत सदस्य रतनमणी भट्ट, नित्यानंद कोठियाल, अक्षित रावत, राजेंद्र सिंह चौहान, परमवीर सिंह रावत, प्रेम सिंह राणा, अरविंद, सुरजीत सिंह चौहान सहित कई लोग मौजूद थे।


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