आपदा के तीन वर्ष बाद शुरू हुए ट्रीटमेंट कार्य सवालों के घेरे मे, डीपीआर सार्वजनिक करने की उठी मांग

 ज्योतिर्मठ।

                 जोशीमठ भू धसाव आपदा के तीन वर्ष बाद ट्रीटमेंट कार्य तो शुरू हुए लेकिन आठ वैज्ञानिक संस्थानों ने किन किन स्थानों को चिन्हित किया है, और कार्य किन स्थानों पर शुरू किए गए इसे लेकर प्रभावित लोगों मे तरह तरह की आशंकाएँ है।

 जोशीमठ आपदा के बाद, जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति के नेतृत्व में जनता के लम्बे आंदोलन के बाद राज्य सरकार ने, प्रभावितो के पुनर्वास और जोशीमठ के स्थिरीकरण से संबंधित सभी मांगो पर सहमति दी। केन्द्र सरकार ने 1640 करोड़ रूपए का पैकेज दिया। जिसमें नगर के स्थिरीकरण और प्रभावितों के पुनर्वास की व्यवस्था होनी थी।

   जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति ने शनिवार को पत्रकार वार्ता कर शुरू किए गए ट्रीटमेंट कार्यों व आशंकाओं को लेकर विस्तृत जानकारी साझा की। संघर्ष समिति के संयोजक अतुल सती ने कहा कि धन की स्वीकृति के बाद बड़े विलम्ब और तमाम शिकायतों के बाद स्थिरीकरण के कार्य प्रारंभ हो पाए। बहुत सा समय डीपीआर डीपीआर के खेल में जाया किया गया  और अभी भी जल निकासी और सीवेज व्यवस्था की डीपीआर का कोई पता नहीं है। स्थिरीकरण के कार्यों की डीपीआर को सार्वजनिक नहीं किया गया है जिससे पता चले कि जो कार्य किए जा रहे हैं वे कितने स्थाई, वैज्ञानिक और भविष्य को सुरक्षित रखने वाले होंगे?

 उन्होंने कहा कि अभी 600 करोड़ रूपए से अधिक के जो कार्य गतिमान हैं उन्हें लेकर तमाम सवाल एवं आशंकाएं हैं। विष्णुप्रयाग, नरसिंह मंदिर सड़क, सुनील और मारवाड़ी आदि में जो कार्य गतिमान हैं उनके चयन का आधार क्या है पता नहीं.. जबकि अति संवेदनशील सिंहद्वार, मनोहरबाग, रविग्राम आदि को क्यों छोड़ दिया गया यह भी स्पष्ट नहीं है। कार्य की गुणवत्ता को लेकर भी तमाम सवाल लगातार उठ रहे हैं।

           23 अप्रैल को एक दैनिक में  उत्तराखंड आपदा प्रबंधन के वरिष्ठ वैज्ञानिक के बयान के बाद और भी सवाल खड़े हो रहे हैं। उनके अनुसार जोशीमठ में 80 मीटर नीचे सॉलिड रॉक मिली है ऐसे में रॉक बोल्टिंग सिर्फ दस बारह मीटर पर किया जाना कैसे सुरक्षित होगा। साथ ही उन्होंने नगर की भूमि के अलकनंदा नदी की ओर खिसकने की गति बढ़ने की बात भी कही है।

एक अन्य वैज्ञानिक डॉ महेन्द्र कुंदरू ने जोशीमठ के धंसाव में गति के चलतेतो एनटीपीसी की परियोजना पर ही खतरे की चेतावनी दी है। साथ अन्य गम्भीर बातें कही हैं। कुछ अन्य वैज्ञानिकों ने अपने हालिया अध्ययनों में सेटेलाइट तस्वीरों के अध्ययन के आधार पर इसी तरह की बातें कही हैं । ऐसे में इन लेटेस्ट अध्ययनों को स्थिरीकरण के कार्य का आधार नहीं बनाना केवल धन का अपव्यय और भविष्य में गम्भीर खतरे को आमंत्रण होगा। कुछ माह पूर्व वाडिया संस्थान के वैज्ञानिक डॉ मेहता ने जोशीमठ के अपने सर्वेक्षण के उपरान्त,भी कुछ नई बातें इस सन्दर्भ में कहीं।

            इसी तरह लगातार बोलने लिखने वक्ती धरना देने के बावजूद पुनर्वास के कार्यों पर पूरी तरह चुप्पी है संदिग्ध रोक है। जिससे प्रभावितों के सामने जीवन का संकट आ गया है। राजीव आवास का मुआवजा, भूमि का मूल्य, भूमि का आवंटन, अन्य मुआवजे व विभिन्न श्रेणी के भवनों का मुआवजा  मूल्य तीन वर्ष बाद भी तय नहीं किया गया है जो जाहिर है जानबूझकर लोगों को पीड़ा देने का षड्यंत्र ही लगता है।

      संघर्ष समिति ने स्पष्ट मांग की है कि जनवरी 2023 के बाद जोशीमठ की भूगर्भिक और भौगोलिक स्थिति के मद्देनजर हुए वैज्ञानिक अध्ययनों को जोशीमठ के स्थिरीकरण के कार्यों का आधार बनाया जाए। जैसा कि जनवरी 2023 में हुए शीर्ष आठ संस्थानों की रिपोर्ट में भी कहा गया था कि , भविष्य में और अध्ययन समीक्षा करनी होगी ।

 स्थिरीकरण के सम्पूर्ण कार्यों की डीपीआर सार्वजनिक की जाए और किए जा रहे कार्यों का सम्पूर्ण ब्यौरा सार्वजनिक किया जाए। साथ ही समय समय पर नागरिकों के साथ बैठक कर कार्यों की समीक्षा की जाए। जोशीमठ के नागरिकों के जीवन और भविष्य के इस संवेदनशील कार्य में पारदर्शिता को सर्वोच्च प्राथमिकता न देना जनता के भविष्य से खेलना है । जिसके परिणाम भयावह होंगे,स्थिरीकरण के कार्य की कार्यदाई कम्पनी को अनावश्यक लाभ पहुंचाने हेतु सार्वजनिक स्थानों को बगैर शुल्क के शेड सामान आदि की सुविधा संदेह पैदा करती है। जहां आम लोगों के लिए निर्माण प्रतिबंधित है वहीं किसी के लिए वह खुला है यह कानून के समक्ष सबकी बराबरी के संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन है।

जोशीमठ आपदा से प्रभावित सबसे संवेदनशील क्षेत्रों यथा सिंहद्वार,मनोहरबाग, रविग्राम आदि में भी स्थिरीकरण के कार्य शीघ्र प्रारम्भ किए जाएं, केवल सरकारी भूमि उपलब्धता वाली जगहों पर स्थिरीकरण के कार्यों से सन्देह की स्थिति बनती है। आपदा प्रभावितों के पुनर्वास की कार्यवाही को गति देते हुए शीघ्र पुनर्वास के कार्य किए जाएं। भूमि का मूल्य, पुनर्वास हेतु भूमि का चयन एवं विभिन्न श्रेणी के आवासों का मूल्य निर्धारण शीघ्र किया जाए।

              आपदा प्रभावितों के रहने की समस्या के मद्देनजर भवन निर्माण सम्बन्धी नीति की समीक्षा की जाए। प्रीफैब हल्के भार क्षमता के गृह निर्माण की अनुमति दी जाए। पत्रकार वार्ता मे संघर्ष समिति के अध्यक्ष शैलेन्द्र पंवार, प्रवक्ता कमल रतूड़ी सहित अनेक लोग मौजूद रहे।

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