वृक्षारोपण एवं पर्यावरण का संदेश देता है प्रकृति के प्रति श्रद्धा का उत्सव लोकपर्व हरेला।।

-------------------- प्रकाश कपरुवाण।
ज्योतिर्मठ।
             उत्तराखंड का हरेला पर्व एक उत्सव का रूप लेता जा रहा है, यह महत्वपूर्ण पर्व न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है बल्कि यह पर्व वृक्षारोपण एवं पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देता है।
        श्रावण के पवित्र मास के प्रारंभ मे श्रावण संक्रांति को प्रतिवर्ष हरेला पर्व मनाया जाता है, उत्तराखंड सरकार भी हरेला को राजकीय पर्व के रूप मे मना रही है क्योंकि हरेला मात्र एक पर्व नहीं यह हमारी समृद्ध संस्कृति और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक भी है।
       
       उत्तराखंड हमेशा से ही पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक रहा है, जब सरकारी कार्यक्रम व तामझाम नहीं होते थे तब भी हिमालय वासियों ने वन सम्पदा को बचाया।
   विश्व प्रसिद्ध "चिपको आंदोलन" उत्तराखंड की ही धरती पर हुआ, यह आंदोलन केवल जंगल काटने पहुंचे ठेकेदार को खदेड़ने के लिए नहीं हुआ था बल्कि पेड़ से चिपक कर वनों को बचाने की यह मुहिम उत्तराखंड की मातृ शक्ति का वनों के प्रति उनके जुड़ाव को भी दर्शाता है।
  अब तो राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण संरक्षण व जलवायु परिवर्तन को लेकर सम्मेलन हो रहे हैं, लेकिन पर्यावरण एवं प्रकृति संरक्षण तभी संभव होगा जब प्रत्येक व्यक्ति एक जिम्मेदार नागरिक व सतर्क प्रहरी के रूप मे अपनी भूमिका निभाएगा, तभी हम प्रकृति एवं प्राकृतिक संसाधनों को बचा पाएंगे।
      हरेला पर्व को जब बड़े स्तर पर पूरे राज्य मे मनाया जाने लगा है तो यह देखना भी जरुरी होगा कि राजकीय स्तर पर हरेला पर्व मनाने की परम्परा शुरू होने के बाद पूरे राज्य मे कितने वृक्षारोपण हुए और कितने धरातल पर मौजूद हैं।
   हरेला कोई राजकीय मेले और त्योहारों की तरह नहीं कि कह दिया जाय कि इस वर्ष जो कमी रह गई वो अगले वर्ष पूरी कर ली जाएगी, हरेला यदि हरियाली व वृक्षारोपण का पर्व है तो अगले वर्ष यह अवश्य देखा जाना चाहिए कि कितने पौधे जीवित हैं और कितना क्षेत्र हरा भरा होने की ओर अग्रसर हुआ है, तभी सही मायने मे उत्तराखंड के हरेला पर्व का महत्व समझा जाएगा।
     

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