औली को तो बर्फ का इंतजार,लेकिन यहाँ तो भारत-चीन सीमा की अग्रिम चौकियां तक रेगिस्तान सी दिख रही है। बिन बर्फ के पर्यटकों के साथ ही बागवानी किसान भी निराश।।

------ प्रकाश कपरुवाण ।
  विश्व विख्यात हिमक्रीड़ा केन्द्र औली जो दिसंबर महीने से मार्च तक बर्फ से लबालब रहती थी,आज बर्फ का दीदार करने तरस रही है, औली को तो अभी भी बर्फ का इंतजार है लेकिन इस बार तो भारत-तिब्बत सीमा की अग्रिम चौकियां जो बर्फ से लकदक रहती थी वहाँ भी इस वक्त रेगिस्तान जैसा नजारा है।
 
 साढ़े दस हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित औली को तो हिमपात की प्रतीक्षा है, यहाँ तो 14 हजार से 18 हजार फीट की ऊंचाई तक भी बर्फ नजर नहीं आ रही है।
  समय पर बर्फबारी का न होना हिमालयी राज्य के लिए शुभ संकेत नहीं कहा जा सकता,बर्फबारी न होने के कारण शीतकालीन पर्यटन ब्यवसाय तो प्रभावित हो ही रहा, बागवानी कृषकों को भी अच्छी फसल की चिंता सताने लगी है।यदि अभी भी बर्फबारी नहीं हुई तो गर्मी के सीजन मे पेयजल संकट भी गहराएगा।
  दिसंबर-जनवरी महीने मे पूर्व वर्षों मे जहाँ श्री बद्रीनाथ-माणा सड़क हनुमानचट्टी से आगे बर्फ से पटी रहती थी, आज स्थिति यह है कि न केवल बद्रीनाथ - माणा बल्कि  भारत-तिब्बत सीमा की अग्रिम चौकियां घस्तोली, रत्ताकोना, व देवताल तक भी बर्फ का नामोनिशां नहीं है।
    
  विश्व विख्यात हिमक्रीड़ा केन्द्र औली व जोशीमठ के पर्यटन ब्यवासायियों को अभी भी उम्मीद है कि बर्फबारी होगी और शीतकालीन पर्यटन के माध्यम से रोजगार की आस लगाए ब्यवासायियों को राहत मिलेगी, इसके लिए ब्यवसायी देवी देवताओं की शरण मे भी जा रहे हैं, शनिवार 6 जनवरी को पर्यटन ब्यवसायी व स्थानीय काश्तकार बर्फबारी के लिए जोशीमठ मे भगवान विश्वकर्मा मंदिर मे विशेष पूजा करंगे।
  समझा जा सकता है कि जोशीमठ-औली के पर्यटन ब्यवसाय व बागवानी के लिए हिमपात का होना कितना आवश्यक है। एक ओर गत वर्ष के भू धंसाव आपदा के बाद से पर्यटन ब्यवसाय की रीढ़ रोप वे बन्द है, वहीं बर्फबारी न होने से पूरे क्षेत्र का पर्यटन ब्यवसाय ही चौपट हो गया है।
  औली मे 25 दिसंबर व न्यू ईयर के मौके पर हजारों पर्यटक तो पहुंचे लेकिन औली मे बर्फ नहीं दिखने से वे मायूस होकर ही लौटे।
  औली की विश्व स्तरीय स्कीइंग ढलान जिसने राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्कीयर्स तैयार किए, कभी सोचा भी नहीं था कि बर्फबारी के सीजन मे ही बर्फ के लिए लालायित होना पड़ेगा।
  बहरहाल पर्यटन ब्यवासायियों व स्कीइंग प्रेमियों को अभी भी बर्फबारी की उम्मीद है, देखना होगा कि कब तक  औली की वादियां एक बार फिर बर्फ से लकदक होगी और स्कीइंग के दीवानों के चेहरों की रौनक लौटेगी।
  वाडिया हिमालयन भू- विज्ञान संस्थान के निवर्तमान बरिष्ठ ग्लेशियर वैज्ञानिक डॉ डी पी डोभाल कहते हैं कि  विंटर मे ट्रेम्प्रेचर बढ़ने से बर्फबारी की प्रक्रिया भी शिफ्ट हो रही है,यह हिमालय के लिए ठीक नहीं है, उनका कहना था कि ग्लेशियर अभी तो टिके हैं लेकिन ग्लेशियर का घटना बढ़ना भी बर्फ पर निर्भर है,यही स्थिति रही तो पेयजल का सबसे बड़ा संकट होगा।

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