----------लक्ष्मण सिंह नेगी-*कल्पबीर*
जोशीमठ,15 सितम्बर।
पंच केदार श्री कल्पेश्वर धाम के शीर्ष पर 9000 फीट की ऊंचाई पर स्थित फ़्यूला नारायण जी का प्राचीन मंदिर है इस मंदिर के कपाट कम समय के लिए खुलते हैं श्रावण संक्रांति अर्थात 15-16 जुलाई को कपाट खुलते हैं और नंदा अष्टमी की नवमी तिथि को विधिवत बंद हो जाते हैं अर्थात 30 अगस्त से 15 सितंबर के बीच ही नारायण के कपाट खुले रहते हैं। फ्यूला नारायण के बारे बहुत अधिक जानकारी इंटरनेट की दुनिया में नहीं है,लेकिन फ़्यूला नारायण के बारे में केदारखंड के स्कंद पुराण 52से 56 अध्याय के बीच वर्णन मिलता है कि दुर्वासा ऋषि के द्वारा मेनका नाम की अप्सरा को इंद्र के स्वागत के लिए
एक पुष्प माला बनाने को कहा गया मेनका नाम की अप्सरा ने इस पुष्प माला को फ़्यूला नारायण धाम में विष्णु के आश्रम से तैयार किया था इसी माला को दुर्वासा ऋषि ने इंद्र के स्वागत हेतु दिया था ।इंद्र ने अत्यधिक मदमस्त होने के कारण इस माला को अपने घोड़े के गले में डाल दिया था दुर्वासा ऋषि ने श्राप दे दिया की तुम्हारी राज्य लक्ष्मी एवं कीर्ति का नष्ट हो जाए इसी श्राप से मुक्ति के लिए देवताओं से इंद्र ने कल्पेश्वर धाम में कई कल्पों तक तप किया थाl फ़्यूला नारायण के बारे में जनश्रुति के अनुसार इस मूर्ति को आज से 500 वर्ष पूर्व नारायण बगड़ से बकरी पालको द्वारा अपनी कंडी में लाने की परंपरा बताई जाती है जब वह पाल्सी सुबह उठकर बिना भोजन किए मूर्ति को ले जाता तो मूर्ति हल्की होने लगती जैसे भोजन ग्रहण करता मूर्ति भारी लगती थी ऐसी मान्यता है नारायणबगड़ से मूर्ति श्री फ़्यूला नारायण में स्थापित की गई वैसे फ़्यूला नारायण मूल रूप से शक्तिपीठ है यहां मां नंदा एवं सुनंदा की भी विधिवत पूजा की जाती है और यह स्थान नारायण से अति प्राचीन है मूल रूप से नंदा एवं सुनंदा का स्थान इसे माना जाता हैl आज भी नारायण के स्थान पर कपाट बंद की कोई परंपरा नहीं होती है यहां भगवती नंदा एवं सुनंदा दाणी देवी के मूल स्थान पर एक विशेष प्रकार की वनस्पति से कपाट बंद करने की परंपरा पूर्व की जाती है। श्री फ्यूला नारायण धाम के कपाट बंद होने से पूर्व कुछ परंपराएं पूर्ण की जाती है भाद्र मास की द्वितीय तिथि को गौरा भवानी छतोली रिगाल से बनी कंडी उस पर भोजपत्र लगी होती है देवग्राम के भल्ला लोगों की कुलदेवी गौरा अर्थात पार्वती को माना जाता है भल्ला लोगों के द्वारा विशेष पूजा यहां नारायण धाम में दी जाती है दूसरे दिन तृतीय तिथि को प्रातः फ़्यूला नारायण में पूजा अर्चना कर मल्यूँ ,रोखनी, बुग्याल पहुंच कर वहाँ भगवती गौरा की विशेष पूजा कर शंकर का ध्यान एवं विशेष प्रसाद चढ़ाकर गौरा को मायका बुला कर लाते हैं यहां गौर की फुलवारी से ब्रह्म कमल को तोड़ कर लाते हैं यह स्थान लगभग 12000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है यहां से चारों तरफ हिमालय के दिलकश नजारे दिखते हैं कई प्रकार की नाना प्रकार के फूल का यहां खिलना मिटना आम बात है उसी दिन जातरी फुल नारायणा मैं विशेष पूजा के बाद श्री कल्पेश्वर धाम होते हुए गौरा मंदिर उगम पहुंचकर फुल कोठे का आयोजन किया जाता है देवी की प्रतिमा की चारों तरफ ब्रह्म कमल से सजाया जाता है। विशेष प्रकार की पूजा कर यह परंपरा संपन्न की जाती है। फ़्यूला नारायण के कपाट बंद होने की दूसरी परंपरा है कि भगवती सुनंदा के मायके वाले पल्ला निवासी हर वर्ष 1 किलो चावल एवं पूजा सामग्री लेकर छठी तिथि को फ़्यूला नारायण पहुंचते हैं उस दिन भरकी गांव से नंदा सुनंदा दाणी, भूमियाल क्षेत्रपाल के प्रतीक चिन्ह एवं कंडी लेकर मुंगरी ,काकडी, रेशमी साड़ी ,चूयूड़ा लेकर गांव के लोग फुल नारायण आते हैं यहां 2 दिन तक भगवती के नंदा एवं सुनादा के जागरण का आयोजन किया जाता है सप्तमी तिथि को सुनंदा नंदा को बुलाने हेतु भनाई बुग्याल पहुंचते हैं वहां विशेष पूजा अर्चना कर भगवती को फूल नारायण बुलाया जाता है यहां ब्रह्मकमल से नारायण का श्रृंगार किया जाता है विशेष प्रकार का राजभोग दिया जाता है अष्टमी तिथि को प्रातः भगवती का विशेष भोग 12 किलो चावल का भोग तैयार किया जाता है साथ ही 4 किलो आटे की पुरी बनाई जाती है हलवा खीर के विशेष भोग के साथ भूमियाल क्षेत्रपाल के अवतारी पुरुष के द्वारा सभी देव डोली के अवतारी पुरुषों एवं छतोली के प्रतिनिधियों को विदा किया जाता है 3 दिन की पूजा का अधिकार भर की पंचनाम देवता के पुजारियों को है अष्टमी तिथि को यहां यहां से देव डोलिया विदा हो जाती हैं नारायण जी के कपाट बंद होने का द्वितीय चरण हो जाता है नवमी तिथि को प्रातः फुल नारायण के पुजारी विधिवत नारायण का स्नान कराते हैं महिला पुजारी के द्वारा पुष्प वाटिका से पुष्प लेकर नारायण के लिए माला तैयार की जाती है महिला के द्वारा भी पूजा अर्चना की जाती है ।मायके वालों के द्वारा दिए हुए 1 वर्ष पूर्व के चावल का खीर बनाया जाता है विशेष राजभोग बाल भोग लगाने के बाद भगवती नंदा सुनंदा दाणी के स्थान पर विशेष प्रकार की वनस्पति लगा दी जाती है जिससे कपाट बंद होना कहते हैं सभी लोगों के भोजन के पश्चात कुछ विशेष लोगों के द्वारा अग्नि कुंड में हवन किया जाता है इस कार्य के लिए ब्राह्मण होना कोई आवश्यक नहीं है हवन पूर्ण होते ही कपाट बंद कर दिए जाते हैं मंदिर की परिक्रमा के बाद वापस भरकी पंच नाम देवता के मंदिर में नारायण से भोग प्रसाद जितना भी वापस आए हैं यहां पहुंच जाता है नवमी तिथि को भरकी गांव में पंच नाम देवता के मंदिर में भव्य दो दिवसीय मेला लगता है फूल नारायण धाम के कपाट खुलने के लिए यहां प्रथम दिन जिस व्यक्ति की अगले वर्ष वारी होगी वह दीपक को जौ से भरे सूपे में मेला प्रांगण में देता है, उसी के बाद मेला की शुरुआत होती है ।
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