नेपाल की प्रलय के बहाने..1

अगले वाटर बम से निपटने को क्या हम तैयार हैं ?

ग्लेशियर का टूटना, ग्लेशियर क्षेत्र में झील बनना, झील का टूटना, बादल फटना या भूस्खलन होना अपने आप में आपदा नहीं है। ये प्राकृतिक घटनाएं हैं। ये तब आपदा बनती हैं, जब इनके रास्ते में आबादी और मानवीय ढांचा आता है और नुकसान को कम करने की हमारी तैयारी कमजोर पड़ जाती है।

नेपाल में हाल में हुई तबाही ने हिमालय के इसी खतरे को फिर सामने ला दिया है। बर्फ, चट्टान, मलबे और पानी की अचानक आई धारा ने जिस तरह तबाही मचाई, वह केवल नेपाल के लिए चिंता का विषय नहीं है। यह पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए चेतावनी है।

अगली ऐसी घटना कहां होगी और कब होगी, यह कोई नहीं बता सकता। लेकिन यह मान लेना कि अब ऐसी घटना दोबारा नहीं होगी, बड़ी भूल होगी। हिमालय में ग्लेशियरों और उनसे जुड़ी झीलों में हो रहे बदलाव के कारण अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा लगातार अध्ययन का विषय बना हुआ है।

  खतरे का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि केंद्रीय जल आयोग भारतीय हिमालयी नदी घाटियों में बड़ी संख्या में हिमनदी झीलों और जल निकायों की निगरानी कर रहा है। आयोग की निगरानी व्यवस्था का उद्देश्य केवल झीलों की गिनती करना नहीं है, बल्कि उनके आकार में बदलाव और संभावित खतरे पर नजर रखना है। 
 
आयोग खुद मानता है कि हिमनदी झील से अचानक पानी निकलने की स्थिति में नीचे के इलाकों में भारी बाढ़ आ सकती है और उसके असर का आंकलन पहले से तय करना आसान नहीं है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने भी हिमालयी राज्यों में संभावित रूप से खतरनाक हिमनदी झीलों की पहचान की है। 
 
उत्तराखण्ड समेत हिमालयी क्षेत्र के अलग अलग स्थानों पर कई झीलें 'वाटर बम' बनी हुई हैं । खतरा अब कोई अनजान संभावना या काल्पनिक नहीं है। घटना तय है, बस हां यह कहना कठिन है कि अगली घटना कहां और कब होगी। 

खतरा आसन्न  है और असली सवाल इससे निपटने का है । किसी झील के टूटने से कितना नुकसान होगा, यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि उसके नीचे कौन-सी नदी घाटी है, कितनी आबादी है और वहां सड़क, पुल, बिजली परियोजना तथा दूसरी संरचनाएं कितनी हैं।

उत्तराखंड में तो यह खतरा  बहुत बड़ा  है।  राज्य में 13 हिमनदी झीलों को संभावित खतरे वाली झीलों के रूप में चिन्हित किया गया है। इनमें पांच को सबसे अधिक संवेदनशील ‘ए’ श्रेणी में रखा गया है, चार ‘बी’ और चार ‘सी’ श्रेणी में हैं। ये झीलें चमोली, पिथौरागढ़, बागेश्वर, टिहरी गढ़वाल और उत्तरकाशी जिलों में हैं।

सबसे अधिक चिंता वाली पांच झीलों में चमोली की वासुधारा ताल और पिथौरागढ़ की माबांग झील तथा प्युंगरू झील के साथ दो अन्य झीलें शामिल हैं, जो दारमा और कुठी यांगती क्षेत्र में स्थित हैं। इन झीलों को ‘वाटर बम’ कहना वैज्ञानिक शब्द तो नहीं है, लेकिन यहां खतरे की गंभीरता समझाने के लिए इसका प्रयोग किया गया है।

  इन झील के टूटने पर पानी के साथ बर्फ और मलबा नीचे आने की आशंका  है। इसके रास्ते में जो कुछ होगा, वह उसकी चपेट में आ सकता है। यानी खतरा झील के किनारे खत्म नहीं होता। खतरा उस पूरी घाटी का है, जिसके ऊपर वह झील स्थित है l 

 उत्तराखंड में तो चिंता केवल हिमनदी झीलों तक सीमित नहीं है। राज्य में ऐसे गांवों की भी पहचान की गई है, जहां प्राकृतिक आपदाओं के कारण परिवारों को सुरक्षित स्थान पर बसाने की जरूरत बताई गई है।

वर्ष 2021 में राज्य सरकार के आंकड़ों के आधार पर 465 गांवों से परिवारों के पुनर्वास की जरूरत सामने आई थी। बाद में ऐसे गांवों की संख्या 484 तक पहुंचने की रिपोर्ट भी सामने आई। 2021 तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार 465 गांवों की पहचान के मुकाबले केवल 44 गांवों के 1,101 परिवारों के पुनर्वास का उल्लेख था।

आपदा के  लिहाज से किसी गांव को संवेदनशील घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक सुरक्षा तो तभी होगी जब उन गाँव के लोगों को सुरक्षित स्थान पर बसाया जाए, उन्हें घर, सड़क, पानी, बिजली, स्कूल और आजीविका की सुविधा मिले और पुराने असुरक्षित स्थान पर उनकी निर्भरता खत्म हो। 

 सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड में आपदा की दृष्टि से असुरक्षित माना गांवों का पुनर्वास हो चुका है? उत्तर असहज करने वाला है।अगर किसी गांव के असुरक्षित होने की जानकारी वर्षों से सरकार के पास है और वहां लोग आज भी उसी जगह रह रहे हैं तो यह केवल  प्रक्रिया और व्यवस्था का ही सवाल नहीं है।  यह  सरकार की संवेदनशीलता पर भी गंभीर प्रश्न है।

ऐसा नहीं है कि उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में कोई काम नहीं हुआ। राज्य में आपदा प्रबंधन की संस्थागत व्यवस्था है, राहत और बचाव का तंत्र विकसित हुआ है और राज्य आपदा प्रतिवादन बल जैसी व्यवस्थाएं काम कर रही हैं। 

 हिमनदी झीलों की निगरानी को लेकर भी सरकार ने अब वैज्ञानिक सर्वेक्षण और नियमित निगरानी बढ़ाने की बात कही है। यही नहीं हर आपदा के बाद सरकार राहत और  बचाव में जुट जाती है। उसके बाद पुनर्निर्माण भी शुरु हो जाते हैं । 

 नेपाल की घटना के बाद सरकार की ओर से एक बार फिर से संवेदनशील हिमनदी झीलों का व्यापक वैज्ञानिक सर्वेक्षण और पूर्व चेतावनी व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं । इस सबके बाद  भी उत्तराखंड का सिस्टम भरोसेमंद नहीं है।  सिस्टम  भरोसेमंद होता तो 2013 की  केदार आपदा के बाद जोशीमठ और धराली में बड़ा नुकसान नहीं उठाना पड़ता। 
 
 सवाल आसन्न खतरे का नहीं है, सवाल यह है कि क्या हमारी तैयारी खतरे के अनुपात में पर्याप्त है? खतरे की पहचान हो चुकी है, लेकिन पहचान के बाद की कार्रवाई को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। आपदा सम्भावित गांवों के पुनर्वास को लेकर  सुस्ती, केदारनाथ में  आपदा के बाद चल रहे पुनर्निर्माण और प्रदेश भर में नदी घाटियों में नदी क्षेत्र में हो रहे व्यापक निर्माण इसका उदाहरण हैं ।

आपदा प्रबंधन का मतलब आपदा के बाद राहत बचाव नहीं है ब्लकि आपदा के खतरे और उससे होने वाले नुकसान को कम करना है। उत्तराखंड के सामने आज खतरे की एक स्पष्ट तस्वीर है। हिमनदी झीलों की पहचान हो चुकी है। संवेदनशील गांवों की सूची मौजूद है। वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध हैं। 

फिर भी कई सवालों के जवाब बाकी हैं। क्या हर संवेदनशील झील की लगातार निगरानी हो रही है? क्या उसके नीचे रहने वाली आबादी का वास्तविक जोखिम आकलन किया गया है? 

 क्या हर संवेदनशील गांव के पुनर्वास की स्पष्ट समयसीमा है? क्या खतरे की स्थिति में चेतावनी सीधे उस गांव तक पहुंचाने की व्यवस्था पूरी तरह तैयार है? और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आपदा को विकास और शासन की प्राथमिकता में वह स्थान मिला है, जिसकी उत्तराखंड जैसे राज्य में जरूरत है? आज इन सवालों के अगर हमारे पास उत्तर नहीं हैं तो यह हमारी नाकामी है। 
 
अगला ‘वाटर बम’ कहां फटेगा, यह हमें नहीं मालूम लेकिन खतरे वाली झीलें और खतरे में पड़े गांव हमें मालूम हैं । हमें 2013 में केदार और उसके बाद ऋषिगंगा और धराली चेता चुके हैं अब नेपाल ने फिर चेताया है। अभी भी हम इन चेतावनियों  को भूलकर आगे बढ़ अगली चेतावनी का इंतजार करते हैं तो यह बड़ी भूल होगी। 

 यह सच  है  कि प्राकृतिक घटनाओं को रोका नहीं जा सकता। लेकिन यह भी  सच्चाई  है प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता को विकास नीति से जोड़कर और सरकारी नीतियों का विरोधाभास खत्म करते हुए उनसे होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।

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