स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज अपनी चारधाम शीतकालीन यात्रा के तहत पांडुकेश्वर पहुंचे थे,जहाँ उन्हें ग्रामीणों के विरोध का सामना करना पड़ा।
दरसअल स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद महाराज जोशीमठ के नरसिंह मंदिर मे दर्शन/पूजन के उपरांत पांडुकेश्वर पहुंचे थे, यहाँ उन्होंने प्रवचन करते हुए कहा कि जोशीमठ में रावल, नायब रावल व शंकराचार्य गद्दी पहुंचती है,और वहाँ के लोगों का कहना है कि भगवान बद्रीविशाल की शीतकालीन पूजा जोशीमठ मे ही होती है,लेकिन पांडुकेश्वर का भी अपना महत्व है।
इस पर वहाँ मौजूद ग्रामीण भड़क उठे, उनका कहना था कि कोई क्या कहता है इससे उन्हें कोई मतलब नहीं, शास्त्र क्या कहता है, उसका जबाब दें। यहाँ आकर भी जोशीमठ का बखान कर रहे हैं इसे बर्दास्त नहीं किया जाएगा ।
ग्रामीणों का गुस्सा देख स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद महाराज भी आवेश मे आ गए,उन्होंने कहा कि शंकराचार्य के रूप मे वे स्वयं शीतकालीन यात्रा का समापन करने पांडुकेश्वर पहुंचे है, और पांडुकेश्वर के महत्व को सिद्ध करने के लिए ही पहुंचे लेकिन यहाँ पर इस तरह की बाते की जा रही है। इतना कहकर वे प्रवचन छोड़ कर चल दिए।
पूरे प्रकरण का लाइव वीडियो मे पांडुकेश्वर के ही युवा सोमेश पंवार कहते हैं कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद महाराज के साथ विवाद ग्रामीणों का हो रहा था लेकिन वे पांडुकेश्वर मे भगवान के दर्शन किये बिना ही लौट गए जो उन्होंने ठीक नहीं किया।
गौरतलब है कि शीतकालीन चारधाम यात्रा की पहली शुरुआत वर्ष 2008-09 मे तत्कालीन चारधाम विकास परिषद के उपाध्यक्ष सूरत राम नौटियाल ने किया था, और उन्होंने भी उस वक्त शीतकालीन यात्रा का अंतिम पड़ाव पांडुकेश्वर किया था, उस वक्त भी उनके निर्णय का विरोध हुआ था, और शीतकालीन यात्रा वाहन को नरसिंह मंदिर जोशीमठ से आगे नहीं बढ़ने दिया था। क्योंकि अनादिकाल से ही शीतकालीन पूजा नरसिंह मंदिर मे ही होती रही है, जिसका उल्लेख बीकेटीसी द्वारा शिलापट्ट मे मे भी किया गया है।
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