जोशीमठ,19नवंबर।
उत्तराखंड के संस्कृत महाविद्यालयों के लिए शासन द्वारा जारी आदेशों में संस्कृत महाविद्यालयों की स्थिति स्पष्ट न होने के कारण संस्कृत महाविद्यालयों के शिक्षकों एवं छात्रों में भ्रम की स्थिति बनी हुई है, जिससे संस्कृत महाविद्यालयों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
श्री बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति कर्मचारी संघ के पूर्व सचिव अरविंद पंत के अनुसार विगत सौ वर्षों से चल रहे संस्कृत महाविद्यालयों के लिए शासन से इस प्रकार का आदेश जारी करना संस्कृत जगत/ सनातन प्रेमियों/ सन्त समाज के लिए दुर्भाग्यपूर्ण तो है ही, इससे सरकार की मंशा पर भी सवाल उठना लाजमी है।
उन्होंने कहा कि 13 मई 2022 को तत्कालीन संस्कृत शिक्षा सचिव ने संस्कृत महाविद्यालयों के 38 नियमित शिक्षकों को उच्च शिक्षा सेवा लाभ सम्बन्धी शासनादेश जारी किया था और वित्त विभाग से स्वीकृति प्राप्त होने के बाद भी इसे लागू नहीं किया गया, बल्कि सभी संस्कृत महाविद्यालयों को उत्तरमध्यमा स्तर का कर इसके आदेश भी जारी कर दिए।
श्री पन्त ने कहा कि सरकार के इस नए आदेश से संस्कृत प्रेमी सरकार की मंशा पर सवाल खड़े हो रहे हैं कि संस्कृत महाविद्यालयों को बनाने के बजाय इन संस्कृत महाविद्यालयों को उत्तरमध्यमा तक के विद्यालय बना दिए गए, जबकि संस्कृत महाविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय परिनियमावली 2007,2009 एवं 2011 के भाग - 3 उपनियम 7.4 में धारित उच्च शिक्षा योग्यता अनुसार निदेशालय से विधिवत हुई है और इन्ही शिक्षकों के द्वारा महाविद्यालय में शास्त्री/ आचार्य कक्षाओं के अध्यापन किया जा रहा है।
श्री बदरीनाथ -केदारनाथ कर्मचारी संघ के पूर्व सचिव एवं वर्तमान वरिष्ठ सदस्य श्री अरविन्द प्रकाश पन्त ने सरकार से अनुरोध किया है कि यथाशीघ्र संस्कृत महाविद्यालयों के लिए स्पष्ट शासनादेश जारी करें, जिससे शास्त्री/ आचार्य कक्षाओं में पढ़ने वाले छात्र छात्राओं का भविष्य प्रभावित न हो, साथ ही श्री अरविन्द प्रकाश पन्त ने कहा कि दुर्भाग्यपूर्ण है कि जो संस्कृत विद्यालय सौ वर्षों से भी पहले से चल रहें है उन संस्कृत विद्यालयों की वित्तीय स्वीकृति वर्तमान सरकार पूर्वमध्यमा(कक्षा 10) एवं प्रथमा (कक्षा 8) मान रही है।
श्री पन्त ने कहा कि सरकार द्वारा दिनांक 16 अक्टूबर 2023 एवं 23 अक्टूबर 2023 को जो आदेश जारी किए हैं उनको शीघ्र वापस नहीं लिया तो संस्कृत प्रेमियों एवं संस्कृत संगठनों को आंदोलन करने पर बाध्य होना पड़ेगा। इसकी सम्पूर्ण जिम्मेदारी सरकार की होगी।
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