जोशीमठ,31जुलाई।
आपको बता दे कि सीमान्त ब्लॉक जोशीमठ के सीमावर्ती गॉव मलारी के ग्रामीणों ने 1962 मे भारत- चीन युद्ध के समय भारतीय सेना को तीन सौ नाली नाप भूमि देश हित को सर्वोपरि मानते हुए उपयोग हेतू दी थी,जिस पर वर्तमान समय में सेना के कैम्प है।
प्रधान संगठन चमोली के महामंत्री पुष्कर सिंह राणा के अनुसार वर्ष 1962 मे युद्ध की स्थिति/आपातकालीन स्तिथि को देखते हुए गॉव वालो ने बिना कोई शर्त या एग्रीमेंट/लिखित पढ़त के ही देश को सर्वोपरि मानते हुए,अपनी नाप भूमि जिस पर अपनी आजीविका का साधन जुटाते थे और जीवनयापन करते थे उस भूमि को भारतीय सेना को दे दी।
लेकिन तब से लेकर आज तक छह दशक बीत जाने के बाद भी सरकार/भारतीय सेना द्वारा ग्रामीणों को कोई भी मुवावजा उस नाप भूमि के बदले नही दिया गया।ग्रामीणों का कहना है कि समय समय पर गॉव वालो द्वारा प्रदेश सरकार,केन्द्र सरकार व भारतीय सेना के उच्च अधिकारियों से इस सम्बन्ध मे पत्राचार व वार्ता की गई लेकिन अभी तक सरकार या भारतीय सेना द्वारा सिर्फ आश्वासन के अलावा गॉव वालो को कुछ नही दिया गया।
ग्रामीणों का ये भी कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी जी के प्रमुख योजनाओं मे एक योजना सीमावर्ती गॉवो को वाइब्रैंट विलेज योजना के माध्यम से विकसित करना है,किन्तु मलारी गॉव मे ठीक इसके विपरीत सेना द्वारा ग्रामीणों की नाप भूमि पर सेना द्वारा पक्के भवनों का निर्माण कार्य किया जा रहा है।
मलारी गांव के पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य श्सुपिया सिंह राणा का कहना है कि हम गॉव वाले भारतीय सेना या सरकार के विरोधी नही है,लेकिन ग्रामीणों के नाप भूमि का मुवावजा मिलना चाहिए ये उनका अपना हक है।औऱ यदि समय पर सरकार या भारतीय सेना द्वारा ग्रामीणों को उचित मुवावजा नही दिया गया तो सीमावर्ती गांव मलारी के ग्रामीणों को मजबूरन सेना द्वारा किए जा रहे पक्के निर्माण कार्यों को रोकने व आंदोलन के लिए बाध्य होना पड़ेगा।
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