फाइल फोटो------
01--बद्रीनाथ मंदिर परिसर में पूर्व सीएम त्रिवेन्द्र रावत का स्वागत करते हकहकूक समाज के बलदेव सिंह मेहता।
02-- बद्रीनाथ मंदिर दर्शन के बाद सिंहद्वार पर
----------------- प्रकाश कपरूवान।जोशीमठ,02 नवंबर।
चारधाम देवस्थानम बोर्ड के विरोध में किसी सनातनी को भगवान केदारनाथ के दर्शनों से ही वंचित किए जाने के मामले की अब चारों ओर निंदा होने लगी है। लोकतंत्र में किसी निर्णय पर असहमति होने पर विरोध-प्रदर्शन, काले झंडे दिखाए जाना व अनशन आदि करना लोकतांत्रिक अधिकार हो सकता है, लेकिन विरोध के नाम पर किसी सनातनी ब्यक्ति को सर्वशक्तिमान भगवान केदार के दर्शनों से ही वंचित कर देना जायज नहीं ठहराया जा सकता।
बीते रोज श्री केदारनाथ में पूर्व सीएम त्रिवेन्द्र सिंह रावत को भगवान केदारनाथ के दर्शनों से रोक दिया गया, क्या किसी निर्णय के विरोध में ऐसा किया जाना जायज हो सकता है ?
देवस्थानम बोर्ड गठन का प्रस्ताव त्रिवेन्द्र रावत कैबनेट की मंजूरी के बाद विधानसभा में पारित हुआ था। हालांकि इस एक्ट का तब से ही विरोध भी शुरू हो गया था। लेकिन इस एक्ट के पारित होने व कानून बन जाने के बाद से चारों धामों के साथ अधीनस्थ मंदिरों में पौराणिक मान्यताओं व परंपराओं के अनुसार पूजाएँ संपादित हो रही है।
विश्व के सर्वश्रेष्ठ भू-बैकुंठ धाम श्री बद्रीनाथ की ही बात करें तो यहाँ यदि श्री बद्रीनाथ मंदिर से जुड़े हकहकूक धारी समाज के लोग देवस्थानम बोर्ड के विरोध मे उतरते तो बद्रीनाथ मंदिर पूजा ब्यवस्था संचालित करना ही मुश्किल हो जाता,लेकिन देवस्थानम एक्ट बनने के बाद भी बद्रीनाथ मे गाडू घड़ी-तेल कलश कार्यक्रम से लेकर घृत कम्बल तक की परंपराएं हकहकूक धारी समाज द्वारा यथावत संपादित की जा रही है।
बीते दिनों बद्रीनाथ धाम पहुंचने पर पूर्व सीएम त्रिवेन्द्र रावत का देवस्थानम बोर्ड बद्रीनाथ एवं हकहकूक समाज द्वारा जोरदार स्वागत किया गया, कहीं भी विरोध के स्वर नहीं सुनाई दिए। इसके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र रावत तुंगनाथ, भविष्य बद्री, गोपीनाथ, त्रिजुगीनारायण आदि अनेक देवालयों मे दर्शनों के लिए पहुंचे, और कहीं भी देवस्थानम बोर्ड के विरोध के स्वर सुनाई नहीं दिए।तब सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर केदारनाथ में ही ऐसा क्यों ?
0 टिप्पणियाँ